Saturday, June 3, 2017

पलाश के दो फूल

पलाश के दो फूल

यूनिवर्सिटी का नया सत्र शुरू हुआ, और गर्मी का समय था । मनीषा, प्रिया, आराध्या, वसुंधरा, अजय और समीर डिपार्टमेंट के बाहर पेड़ की छाँव में बैठे थे । ग्रेजुएशन का आखिरी साल पास करके सभी ने पोस्ट ग्रेजुएशन करने के लिए एडमिशन लिया था । कोई क्लास थी नही इसलिए सभी दोस्त आपस में गप्पे लड़ा रहे थे और अपने - अपने किस्से एक दूसरे को सुना रहे थे । तभी गले में गमछा डाले, कांधे पर बैग लटकाए एक सामान्य रंग रूप वाला लड़का आता दिखा । वसुंधरा जो कि बहुत ज़्यादा शैतानियाँ करती थी, वो उसको देखती ही बोली, “ये कोई न्यू एडमिशन लगता है, आओ इसको परेशान करते हैं ।” मनीषा, प्रिया, और आराध्या भी उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे । अजय और समीर भी बोले, “ठीक है तुम लोग इसे परेशान करो, तो आज कैंटीन में कोल्ड ड्रिंक और समोसे पक्के ।”

चूँकि गर्मी की छुट्टियों के बाद सब दोस्त मिल रहे थे, इसलिए सबके दिल और दिमाग में बहुत सारी मस्तियाँ हिलौरे मार रही थीं । फिर जैसे ही वो लड़का पास पंहुचा तो वसुंधरा ने उसको आवाज़ लगाते हुए कहा, “फ्रेशर ?” लड़का पसीने से लथपथ था, शायद ठीक से सुन नही पाया और बोला, “भास्कर” । वसुंधरा ने फिर से पूछा, “न्यू एडमिशन ?” लड़का बोला, “हाँ.... गाँव से आया हूँ ।” वसुंधरा समझ गयी कि ये लड़का उसकी बात समझ नही पा रहा है । फिर भी शैतानी खोपड़ी मानने वाली कहाँ थी ? उसने सीधा सा पूछा, “यहाँ क्या करने आए हो ?” लड़का गमछे से अपना पसीना पोछते हुए बोला, “जी मेरा नाम भास्कर है और मुझे शर्मा सर से मिलना है, वो हैं ना जो यहाँ के बड़े सर हैं, उनसे ही मिलना है । मेरे पिता जी ने भेजा है और कहा है शर्मा सर से मिलकर रहने के लिए हॉस्टल की बात कर लेना ।”
उसकी भोली भाली बातें सुनकर वसुंधरा के मन में शैतानी सूझ उठी, उसने मनीषा और प्रिया को आँख मारते हुए कहा, “शर्मा सर तो अभी थोड़ी देर पहले कहीं चले गए हैं, अब तो वो दो घन्टे बाद ही मिलेंगे ।” अजय ने भी उसका साथ दिया और कहा, “यार! तुम थोड़ा सा लेट हो गए, अगर आधे घंटे पहले आ जाते तो शर्मा सर तुम्हें मिल जाते अब तुम जाओ और कल जल्दी आना ।” भास्कर ज़रा हताश सा हो गया, लेकिन वो बोला, “शर्मा सर दो घंटे में तो आ जायेंगे तब मैं उनसे मिल लूँगा| उसने उन्हीं लोगों से पूछा, मैं यहीं कहीं बैठ कर इंतज़ार कर लूँ ?” आराध्या उसको दूसरी तरफ का इशारा करते हुए बोली, “ठीक है, जाओ उस पेड़ के नीचे बैठ जाओ ।” भास्कर फिर उस पेड़ की तरफ़ चला गया ।
इधर सभी आपस में हंसने लगे, क्यूंकि बड़ी आसानी से उन सबने भास्कर को बेवकूफ़ बना दिया था। सबको पता था कि शर्मा सर सुबह से ही स्टाफ रूम में बैठे हैं । सब बार -  बार भास्कर को देख रहे थे और आपस में हंस रहे थे । लेकिन ना जाने क्यों वसुंधरा को कुछ अजीब सा लगने लगा ?
उधर भास्कर ने पेड़ की छाँव में बैठकर अपने बैग से एक कागज़ का पैकेट निकाला और घास पर रुमाल बिछा कर पैकेट से तीन रोटियां और गुड निकाल कर रख दिया और रोटियों के सामने हाथ जोड़कर उन्हें खाना शुरू कर किया । अब सब उसे बड़े गौर से देख रहे थे । वसुंधरा ने तो अपनी पूरी ज़िन्दगी में किसी को इस तरह रोटी खाते हुए नही देखा था । 
पता नही क्यों वसुंधरा को भास्कर का ये सीधापन और सरलता आकर्षित सा करने लगे, वो बार – बार भास्कर को देखने लगी । अचानक ही भास्कर उठा और उन लोगों की तरफ़ आने लगा । वसुंधरा को कुछ डर का एहसास सा हुआ । भास्कर ने आते ही पूछा, “यहाँ कहीं हैंड पंप है क्या ? प्यास लगी है बहुत ज़ोर की” । तभी प्रिया अपने पास से पानी की बोतल निकाल के उसे देती हुई बोली, “यहाँ हैंड पंप नहीं है, लो इस बोतल से पानी पी लो ।” भास्कर ने बोतल ली और एक ही सांस में पानी की आधी बोतल ख़ाली कर दी और बोतल देते हुए बोला’ “भगवान् आपको ख़ुश रखे” और वो फिर से पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया ।
उसका ऐसा व्यवहार उन सभी के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था । सभी ऐसे उसे देखने लगे जैसे कोई नई चीज़ देख ली हो । कभी वो आपस में बातें कर रहे थे तो कभी उसकी तरफ़ देख रहे थे । बातों – बातों में करीब एक घंटा गुज़र गया था, तभी समीर बोला, “यार, चलो कैंटीन चलते हैं भूख लगी है।” सभी ने उसको सहमति दी और फिर सब कैंटीन की तरफ़ चल पड़े । इस बीच वसुंधरा ने भास्कर को कई बार देखा, भास्कर ने भी उन्हें जाते हुए देखा लेकिन वो चुपचाप बैठा रहा । और फिर कैंटीन पंहुचकर सब मस्ती करने लगे और खाने – पीने लगे, और उसके बाद किसी का भी वापस क्लास में जाने का मन नही हुआ, तो सब अपने - अपने घर की ओर निकल पड़े ।
इधर वसुंधरा जब घर आने के लिए ऑटो में बैठी तो उसे कुछ अजीब सा लग रहा था । न जाने क्यों उसका मन शांत नहीं था, कुछ बेचैनी सी थी, उसे लगा कि शायद उसने भास्कर को परेशान करके अच्छा नही किया । उसने ख़ुद को बिजी करने के लिए अपने कान में हेड फ़ोन लगाकर म्यूजिक ऑन कर लिया, लेकिन २ मिनट बाद उसे भी बंद करके रख दिया, आज उसे अपनी पसंद के गाने भी अच्छे नहीं लग रहे थे । घर पंहुच कर उसने हाथ – मूँह धोया और जाकर अपने बिस्तर पे लेट गई और लेटे – लेटे कब सो गई कुछ पता ही नही चला| आँख तब खुली जब माँ ने आकर जगाया और बोली, “और कितना सोगी बेटा ? देखो शाम के साढ़े सात बज रहे हैं, उठो अब, देखो तुम्हारे पिता जी भी आ गए हैं ।” उठती हूँ माँ, ये कहकर वसुंधरा ने लम्बी अंगड़ाई ली । और अपने बालों को सँभालने लगी ।
रात हुई तो खाने की मेज पर वसुंधरा के साथ सब बैठे – माँ, पिता जी और छोटा भाई रिंकू । आपस में बातें हो रही थीं और सभी खाने का आनंद ले रहे थे । खाना खाकर सभी ने टी वी देखा और 11 बजे के बाद सब सोने चले गए । वसुंधरा अपने कमरे में आई और उसने अपनी वो डायरी निकाली जिसमें वो हर दिन अपने दिल की उन बातों लिखा करती थी, जो वो किसी और से ज़रा भी नहीं बताती थी । और फिर उसने आज की बातों को लिखना शुरू कर दिया और आज भी उसकी डायरी में कुछ ऐसी बातें लिखी गईं जो उसने किसी को भी नहीं बताई थी, और आज बातों में ज़िक्र था भास्कर का ।
अगले दिन वसुंधरा यूनिवर्सिटी आई और उसने क्लास भी अटेंड की, लेकिन उसके मन में एक सवाल उठ रहा था कि, “कल भास्कर का क्या हुआ होगा ?” उसने अपने दोस्तों से बात करने की कोशिश भी की, लेकिन सब अपनी मस्ती में रहे, किसी ने उसकी बातों पर ज़्यादा ध्यान नही दिया । उसे लगा कि शायद भास्कर आज आएगा तो पता चलेगा कि, “कल क्या हुआ था ?” दिन के चार बज गए लेकिन भास्कर आया नही और न ही किसी ने कुछ कहा फिर वसुंधरा अपने मन में कुछ सवाल लेकर अपने घर की तरफ़ चल पड़ी । उसके मन में भास्कर को लेकर एक अजीब सी कशमकश चल रही थी ।
ऐसे नौ दिन गुज़र गए लेकिन भास्कर नहीं आया, न ही उसका कोई ज़िक्र हुआ| उधर वसुंधरा के मन में अभी तक वो सवाल घूम रहा था कि, “आखिर भास्कर के साथ क्या हुआ होगा ?” दसवें दिन जब क्लास चल रही थी तभी बीच क्लास में किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी, “क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ ?” सभी की नज़रें दरवाज़े पर पंहुच गई । इजाज़त मिलने पर वो सबसे पीछे जाकर बैठ गया । वो भास्कर ही था, वसुंधरा उसे देखते ही पहचान गई, उसे देख कर उसको अन्दर से बड़ी ख़ुशी हुई । उसने सोचा कि, “क्लास के बाद वो उससे पूछेगी उसके बारे में” लेकिन क्लास के बाद उसे पता ही नही चला कब भास्कर बाहर चला गया ? और फिर आया ही नहीं ।
अगले दिन जब वसुंधरा क्लास में आई तो उसने देखा, भास्कर क्लास में बैठा है और कुछ पढ़ रहा है । क्लास के बाद जब वो बाहर निकला तो उसने समीर और अजय से हाथ मिलाया और उनसे बातें करने लगा| बातों – बातों में उसने अपने बारे में बताया कि, “वो अपने गाँव से यहाँ यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन करने आया है । इसके बाद वो और आगे की पढाई करेगा ।” समीर और अजय को उसका नेचर बहुत अच्छा लगा उन लोगों ने भास्कर से दोस्ती भी कर ली । वसुंधरा ने भी आगे बढ़कर उसके हाल - चाल लिए और हाथ मिलाकर दोस्ती की शुरुआत भी कर ली । भास्कर को भी ये बहुत अच्छा लगा । और फिर थोड़े ही दिनों में भास्कर ने उन सभी से दोस्ती कर ली । मनीषा, प्रिया, आराध्या, वसुंधरा, अजय और समीर सभी को उसका साथ अच्छा लगने लगा । वो उन सभी से बड़ी अच्छी - अच्छी बातें करता था, उनके साथ वक़्त भी गुज़ारता था । और अपना मन पढने में भी खूब लगाता था ।
उधर वसुंधरा अक्सर ये कोशिश करती थी कि वो ज़्यादा से ज़्यादा भास्कर के साथ रह सके और उससे ढेरों बातें कर सके । जब भी मौका मिलता वो उसके पास आ जाती और उससे खूब बातें करती| भास्कर भी उससे हंस - हंस के बातें करता था । वसुंधरा अपने टिफ़िन में जो भी लेकर आती वो भास्कर को ज़रूर खिलाती । उन दोनों को साथ में देखकर सारे दोस्त भी खूब हंसी मज़ाक करते थे । वसुंधरा अपने दिन भर की बातों को अपनी डायरी में लिखा करती थी और उनमें अक्सर भास्कर का ज़िक्र ज़रूर होता था।  भास्कर भी उसे दुनियाँ जहान के ढेरों किस्से सुनाया करता था । वसुंधरा दिन – रात भास्कर के बारे में सोचा करती थी । वो इंतज़ार करती थी कि कब मौका मिले और वो भास्कर से मिले और उससे बाते करे, और जिस दिन वो भास्कर से नहीं मिल पाती थी उसका मन नहीं लगता था । भास्कर को भी उससे मिलना और बातें करना बहुत अच्छा लगता था ।
भास्कर जब कभी छुट्टियों में अपने गाँव चला जाता तो वो वक़्त वसुंधरा से काटे नहीं कटता था । भास्कर जब हास्टल में रहता था तो उससे मिल भी लेती थी और फ़ोन पर बात हो जाती थी, लेकिन जब वो गाँव में होता तो फ़ोन पर बात भी नहीं हो पाती थी । वक़्त गुज़रने लगा और धीरे – धीरे डेढ़ साल पूरे होने को आए, भास्कर अब अपनी पढ़ाई में ज़्यादा व्यस्त हो गया । वो अपना ज़यादातर वक़्त पढ़ाई लिखाई को देने लगा । वसुंधरा को उसका इतना व्यस्त होना अच्छा नहीं लगता था, लेकिन वो कुछ कह नही पाती थी । क्योंकि उसने कभी भी अपने दिल की बातों को भास्कर को नहीं बताया था । शायद इसीलिए भास्कर भी बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाता था ।
आखिर फाइनल एग्ज़ाम का टाइम नज़दीक आ गया, सब कड़ी मेहनत करने में व्यस्त हो गए, एक दूसरे से सम्पर्क बहुत कम हो गया । वसुंधरा ने भी अपने आप को समझाया और वो भी पढाई में व्यस्त हो गई । सभी के पेपर्स बहुत अच्छे हुए और सभी अपने - अपने सुनहरे भविष्य की कल्पनाओं में खो गए । एग्ज़ाम के बाद भास्कर ने वसुंधरा से मुलाक़ात की । दोनों साथ में बैठे, बातें की, काफी वक़्त साथ गुज़ारा । और फिर जब वसुंधरा ने उससे पूछा कि, “तुम अब आगे क्या करोगे ?” तो भास्कर ने उसे जवाब दिया, “मुझे अपनी ज़िन्दगी में बहुत सारे काम करने हैं, अपने माँ – बाप का नाम रौशन करना है, बहुत सफल होना है मुझे, और इसके लिए मुझे बाहर जाना है, मैं अब दिल्ली जाऊंगा और वहां से अपनी मंज़िल को तलाशुंगा ।” वसुंधरा को उसका ये जवाब अच्छा नहीं लगा । वो कुछ परेशान सी हो गई, लेकिन उसने भास्कर से कुछ कहा नहीं । फिर भास्कर ने जब उससे पूछा कि, “तुम अब क्या करोगी ? तुमने अब क्या सोचा है ?” वसुंधरा ने बुझे हुए स्वर में कहा, “कुछ पता नही, कुछ भी सोचा नही है ।” और फिर दोनों विदा होकर अपने - अपने रस्ते चल पड़े ।
वक़्त तेजी से गुज़रने लगा और देखते ही देखते 6 महीने बीत गए और इन 6 महीनों में सिर्फ 3 बार वसुंधरा और भास्कर की बात हुई । भास्कर अपनी दुनियाँ में व्यस्त था और वसुंधरा उसी के ख्यालों में खोई रहती थी । कभी वो कविता लिखा करती थी, कभी वो अपनी डायरी पढ़ा करती थी, कभी घंटो खिड़की से बाहर निहारा करती थी, शायद किसी को ढूंढा करती थी । उसके माँ और पिता जी जब उससे कुछ बात करते थे या कुछ पूछते थे वो अक्सर शांत हो जाती थी, उन्हें लगता था कि शायद बेटी को कोई तकलीफ़ है जो वो उनसे बताती नहीं है । कहीं उसका मन नहीं लगता था, न तो कोई त्यौहार उत्साह से मानती थी, न ही किसी पार्टी या फंक्शन में जाती थी, न ही किसी रिश्तेदार के घर जाती थी । बस उसकी दुनियाँ उसके घर और उसके कमरे तक ही सीमित हो गई थी । जो वसुंधरा किसी समय पूरे घर को सिर पर उठा लेती थी, वो अब इतनी खामोश रहती थी कि जैसे तूफ़ान थमने के बाद सन्नाटा हो जाता है । अब तो उसने अपने दोस्तों से बात करना भी बंद कर दिया था, माँ – बाप ने जब कहा कि, “बेटा! अगर कोई कोर्स करना चाहती हो या और आगे पढना चाहती हो तो पढ़ लो, पर यूँ उदास - उदास न रहो” पर उसने मना कर दिया| उसने कह दिया, “मुझे कुछ नही करना और कहीं नहीं जाना, बस घर में ही रहना है ।” माँ – बाप को उसका ऐसा व्यवहार ठीक नहीं लगा और उन्हें बहोत दुःख हुआ । लेकिन वो ये समझ गए कि वसुंधरा को कोई परेशानी ज़रूर है जिसे वो बता नही रही है ।
एक अरसा गुज़र चुका था लेकिन भास्कर की वसुंधरा से बात नहीं हुई थी । वसुंधरा एकदम गुमसुम रहती थी । माँ – बाप ने सोचा कि, “कब तक आखिर बेटी ऐसे हाल में रहेगी ? यूँही तो ज़िन्दगी नहीं चलती । अगर वो कुछ आगे करना नही चाहती है तो उसकी शादी करा देते हैं । शायद शादी के बाद वो पहले की तरह हो जाए, घर गृहस्थी में मन लगेगा तो जो एकाकीपन है है ज़िन्दगी का वो दूर हो जायेगा।” माँ – बाप को ये भी एहसास था कि ज़्यादा वक़्त अगर बेटी ऐसे हाल में रही तो लोग तरह – तरह की बातें बनायेंगे । बहुत सोचने समझने के बाद उन्होंने वसुंधरा से कहा, “बेटी! अब हम तुम्हारी शादी कर देना चाहते हैं, तुम तैयार हो शादी के लिए ? ” वो बोली – “आप लोगों को जैसा बेहतर लगे, आप लोग करिए । मुझे कोई प्रॉब्लम नही है ।”
बेटी की तरफ़ से कोई ऐतराज़ न होने पर माँ -  बाप ने उसके लिए जोर - शोर से लड़का देखना शुरू कर दिया । कुछ ही दिनों में वसुंधरा के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता मिल गया| लड़का आई. ए. एस. अधिकारी था । लड़के की कुंडली भी वसुंधरा की कुंडली से मिल गई थी । लड़के की फ़ोटो जब घर आई तो माँ ने वसुंधरा को फ़ोटो दिखाई तो बिना फ़ोटो देखे वसुंधरा ने कह दिया, “माँ! मुझे फ़ोटो देखने की कोई ज़रूरत नहीं है, आप लोगों ने मेरे लिए जो भी लड़का पसंद किया होगा वो अच्छा ही होगा । मेरे फ़ोटो देखने या न देखने से कोई फर्क नहीं पड़ता । आप लोग जो चाहेंगे और जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा । मुझे आप की पसंद बिना देखे भी मंज़ूर है ।”
बेटी से ऐसा जवाब सुनकर माँ की आँखे भर आई, और मन ही मन वो सोचने लगी कि, “कितनी अच्छी है उनकी बेटी, जो उनका इतना सम्मान करती है और उनकी पसंद को अपनी पसंद मानती है, किसी माँ – बाप को और क्या चाहिए ?” और फिर कुछ ही दिनों में शादी की तैयारियाँ शुरू हो गई, उधर वसुंधरा ने भी अपने दिल पर पत्थर रख लिया था और भास्कर की यादों को भुलाना शुरू कर दिया था, अब वो उसके बारे में सोचना भी नही चाहती थी, क्यूंकि अब वो किसी और की होने जा रही थी ।
और फिर शादी का दिन आ ही गया पूरा घर मेहमानों से भरा हुआ था, ख़ुशी के गीत गए जा रहे थे, वसुंधरा को सजाया जा रहा था, मेहँदी और हल्दी लग रही थी, सहेलियां हँसी – मज़ाक कर रही थीं, पुराने दोस्तों में मनीषा, आराध्या, अजय और समीर आए हुए थे, प्रिया देश से बाहर थी इसलिए वो नहीं आ पाई । सभी बहुत खुश थे, आपस में पुराने किस्से सुने – सुनाए जा रहे थे । एक दूसरे की टांग खींच रहे थे । सब वसुंधरा को छेड़ रहे थे, आज बहुत दिनों बाद वो इतना खुलकर हँस पा रही थी, आज उसने ज़माने बाद थोड़ी बहुत शरारत भी की, आज वो इतना ख़ुश थी कि एक बार तो उसने ये भी सोच लिया, “जैसे सब दोस्त आए हैं काश वैसे ही भास्कर भी आ जाता और उसकी शादी होते देखता तो उसे बहुत ख़ुशी होती ।” लेकिन किसी को भी भास्कर के बारे में कोई ख़बर नहीं थी ।
खैर रात हुई और दरवाज़े पे बारात आ गई, घर के सभी लोग स्वागत - सत्कार में लग गए, रस्में अदा होने लगी और घोड़ी पे सवार दुल्हे राजा को उतार कर बिठाया गया । उनकी आवभगत होने लगी । लड़के वाले भी स्वागत – सत्कार से बड़े ख़ुश हुए । मनीषा, आराध्या, अजय और समीर भी परिवार के सदस्य की तरह काम में लगे हुए थे, किसी को बारातियों की देख भाल करनी थी, तो किसी को खाने का देखना था, तो किसी को वसुंधरा के पास रहना था, सब बड़े व्यस्त थे । और फिर आई फेरों की बारी । लाल रंग के जोड़े में वसुंधरा किसी राजकुमारी से कम नहीं लग रही थी, उसने अपना आधा चेहरा घूँघट से ढका हुआ था, और दूल्हे राजा भी शेरवानी पहने सर पे सेहरा सजाए बहुत जंच रहे थे । लेकिन वसुंधरा ने सर उठा कर कर एक बार भी अपने दूल्हे को नहीं देखा । एक, दो, तीन और फिर सात फेरे पूरे हो गए, सभी रिश्तेदार फूल बरसाकर बधाई दे रहे थे । हर कोई ख़ुश था, चाहे वो लड़के वालों की तरफ़ से हो या फिर लड़की वालों की तरफ़ से ।
सभी लोग दूल्हा – दुल्हन को बधाई देने लगे, कोई हाथ मिला रहा था, कोई आशीर्वाद दे रहा था, कोई सर पर हाथ फेर रहा था, और फिर सबसे आखिर में वसुंधरा के यूनिवर्सिटी के दोस्त भी उसे गले लगकर बधाई देने लगे । मनीषा, आराध्या और अजय के बाद जैसे ही समीर ने उसे गले लगाया, किसी ने आवाज़ दी, “वसुंधरा जी लाइन में हम भी हैं, हमें भी ज़रा गले से लगा लीजिए” वसुंधरा ये सुनते ही चौंक पड़ी, ये वो आवाज़ थी, जिसे वो लाखों की भीड़ में पहचान सकती थी । ये वो आवाज़ थी जिसे सुनने की हसरत उसे न जाने कबसे थी ? ये वो ही आवाज़ थी, जिसके बारे में उसने सोच लिया था कि शायद अब कभी दुबारा सुन न सके । उसने सर उठा के देखा.... लेकिन उसे समझ ही नही आया कि ये आवाज़ आई कहाँ से ?
अचानक उसकी नज़र अपने दूल्हे पर पड़ी, जिसने अभी – अभी अपना सेहरा हटाया था, वसुंधरा की आँखे फटी की फटी रह गई, उसकी नज़रें हट नहीं पा रही थी, उसके मुँह से आवाज़ नही निकल पा रही थी। ऐसा लग रहा था कि उसकी ज़बान चिपक गई है । वो कोई और नहीं भास्कर था, वो ही भास्कर जिसके इंतज़ार में वसुंधरा एकदम बाँवरी हो गई थी । और भास्कर ने ही उसे आवाज़ दी थी । भास्कर के चेहरे पर एक मासूम से हंसी थी और वसुंधरा एकदम बेसुध सी हो गई थी । वो समझ नही पा रही थी क्या करे और क्या न करे ?
भास्कर उसके पास आया, और बोला, वसुंधरा जी, “अब हमें भी गले से लगा लीजिए, अब तो हमने आपसे शादी भी कर ली है, वसुंधरा बिना कुछ बोले उसके गले लग गई और उसकी आँखों से आंसुओं की झड़ी लग गई.......................”

वो 5 लड़के

कहते हैं ज़िन्दगी दो तरह से जी जाती है, एक तो जो हो रहा है वो होने दो और उसी में खुश रहो, दूसरा ये कि वो करो जो दिल चाहता है और अपने सपनों को पूरा करो । पहले तरीके से जीने वाले बहुत सारे मिल जाते हैं, लेकिन दूसरे तरीके से जीने वाले बहुत कम मिलते हैं । ये कहानी है ऐसे ही 5 लड़कों की, जो ज़िन्दगी को अपने तरीके से जीते हैं, जो ज़िन्दगी को एक खेल की तरह जीते हैं, वो सुनते तो सब की हैं लेकिन करते वही हैं जो उनका दिल चाहता है । इस कहानी की शुरुआत होती है एक यूनिवर्सिटी से । जहाँ जर्नलिज़म पढ़ने आए ये पाँचों लड़के एडमिशन लेते हैं । अलग – अलग जगह और अलग – अलग परिवारों से आए ये लड़के वैसे तो एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं । सबका रंग – रूप, कद – काठी एक दूसरे से बिल्कुल जुदा है, लेकिन बहुत सी बातें उनमें एक जैसी ही है ।
जुलाई का आख़िरी सप्ताह चल रहा है । लड़के – लड़कियाँ सब अपने सुनहरे भविष्य के सपने सजाए यूनिवर्सिटी में आ चुके हैं । क्लासेज लगने लगे हैं, सुबह से शाम तक यूनिवर्सिटी गुलज़ार रहती है । मौसम भी अपने सुहाने रंग दिखाता रहता है । कभी काले – काले बादलों की घटायें छा जाती हैं, रिमझिम फुहारें पड़ती हैं, कभी बारिशों की लड़ी लग जाती है तो कभी शाम को ठंडी हवाएं चलने लगती हैं, और जब मौसम का मिजाज़ ठीक न हो तो कड़क धूप होती है और भयंकर गर्मी पड़ती है । ऐसे बदलते मौसम में जवान मन भी कहाँ मानता है ? मन का मयूर मौसम का मज़ा लेने के लिए निकल पड़ता है । क्लास को बंक मार के सुहाने मौसम में घूमने - फिरने का एक अलग ही मज़ा है ।
सब मस्ताने झुण्ड बनाकर निकल पड़ते हैं, कहीं लड़कियों का अपना ग्रुप होता है, कहीं लड़कों का अपना अलग, तो कहीं – कहीं पे लड़कों और लड़कियों का एक मिलाजुला ग्रुप होता है । लेकिन सब अपने मन की करना चाहते हैं, घूमे – फिरे, खाएं – पिएं, और फ़ोटो खिंचवाएं । वो कहते हैं न कि ये उम्र ही ऐसी होती है जवानी की, जहाँ फ़िक्र कम होती है और मस्तियाँ ज़्यादा । वैसे भी यूनिवर्सिटी में दोस्ती ज़रा जल्दी होती है, क्योंकि कई सारे काम मिलकर करने होते हैं, प्रोजेक्ट बनाने होते हैं, असाइनमेंट पूरे करने होते हैं, नोट्स एक – दूसरे को शेयर करने होते हैं, गप्पे भी लड़ानी होती हैं इसलिए जिसकी जितनी जल्दी दोस्ती हो जाती है, उसके लिए उतना ही अच्छा होता है । तो जर्नलिज़म का कोर्स करने आए ये 5 लड़के भी बहुत जल्दी अपनी क्लास के ज़्यादातर लड़के - लड़कियों के दोस्त बन जाते हैं, और आपस में भी । ऐसे दोस्त कि सब काम साथ में ही करते हैं.... आना – जाना, पढ़ना – लिखना, उठना – बैठना, ख़ाली पीरियड में शैतानी और मस्ती, या फिर लड़कियों को जोक्स सुनाने हो, या टिफ़िन चुरा के खाना हो । या फिर किसी की टांग खींचनी हो या कैंटीन में जाकर उधम करनी हो, सब साथ में ।
इन पांच लड़कों में पहला है... जॉर्डन, दोस्तों का दोस्त और यारों का यार, नेचर फोटोग्राफी और घूमने – फिरने का सबसे ज़्यादा शौक़ीन और छुप – छुप के सिगरेट पीने वाला । आर्मी ज्वाइन करना चाहता था लेकिन कर नहीं पाया तो जर्नलिज़म की दुनियाँ में आ गया । दूसरा लड़का है... राजे, ये पहले वाले से भी ज़्यादा यारों का यार है, इसके लिए अपनी ख़ुशी बाद में है, यार का ग़म पहले है । दोस्तों की मद्द करने के लिए कुछ भी कर सकता है । इसे खिलाने – पिलाने का बहुत शौक है । और तीसरा है... अवी, एक नंबर का गुस्सैल, गाने का बहुत शौक़ीन है, अक्सर अपने बेसुरे राग अलाप कर बोर करता रहता है । लेकिन दोस्तों के लिए कुछ भी कर सकता है, ख़ुद ज़मीन पर सो जाएगा लेकिन दोस्त को बेड पर ही सुलाएगा । इमोशनल भी बहुत है, कभी – कभी रो भी देता है । इनमें चौथा है.... सौर, ये अपने टाइप का अलग ही इन्सान है, इसे सबसे ज़्यादा मज़ा दोस्तों की टांग खींचने में आता है, जर्नलिज़म की दुनियाँ में बड़ा नाम कमाना चाहता है, इसलिए रात – रात भर जागता है, मेहनत करता है, और क्लास में सबसे लेट । और इन सबका पाँचवा दोस्त है... सैम, ये सबसे ज़्यादा ख़ुरापाती दिमाग का है, ये कभी किसी काम के लिए ना नहीं कहता । हर काम में आगे । इसे फ़िल्में देखने का बहुत शौक है, अक्सर ये दोस्तों को फ़िल्म दिखाने का प्लान बनाता रहता है । लेकिन है बड़ा शैतान ।
पांचों अपनी अलग – अलग दुनियाँ से आए हैं, और उनके अपने – अपने सपने हैं । वैसे भी सबके सपने एक जैसे नहीं होते । जहाँ जॉर्डन अपना ख़ुद का पब्लिकेशन हाउस बनाना चाहता है, वहीं राजे चाहता है कि, “वो एक बड़ा फ़िल्म मेकर बने, चाहे उसके लिए कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े....?” वैसे जॉर्डन का एक सपना और भी है..... कोई है, जिसके ख़यालों में वो अक्सर खो जाता है, जिसकी तस्वीर अपनी आँखों से दिल में उतार कर वो अक्सर नदी के किनारे बैठ कर कागज़ पर बनाया करता है, सभी जानते हैं कि, “जॉर्डन उस लड़की को बहुत पसंद करता है ।” लेकिन राजे की ज़िन्दगी में फ़िलहाल ऐसा कुछ भी नहीं, हाँ... दोस्त की इस मामले मद्द ज़रूर करता है, वो भी पूरे दिल से । उधर  अवी का सपना है कि, “वो किसी बड़े मीडिया हाउस में एक एडिटर बने ।” लेकिन एक सपना तो इसका और भी बड़ा है, किसी फ़िल्मी हीरो की तरह ये भी रोमांस का किंग बनना चाहता है और भगवान ने इसकी सुनी भी, इसे अपनी एक क्लासमेट से प्यार हो गया । और उसका प्यार पाने के लिए इसने प्रयास भी करने शुरू कर दिए ।
लेकिन सौर थोड़ा अलग हटके सोचता है, ख़ुद का न्यूज़ पेपर चलाना चाहता है, और उसका ये मानना है कि जब तक मुझे मेरे सपनों की रानी नहीं मिलेगी, तब तक मैं कोशिश करता रहूँगा और ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियों के पास प्रणय निवेदन लेकर जाता रहूँगा । वैसे लकी है सौर क्योंकि क्लास की एक बहुत प्यारी सी लड़की उसे ख़ुद से भी ज़्यादा चाहती है । और इस कहानी का आख़िरी हीरो तो बस पैसा कमाना चाहता है, यानी कि सैम... काम सही हो या ग़लत अगर थोड़ी मेहनत करने से पैसे आ जायें तो ये कर ही लेता है और ये अपने सारे काम इधर – उधर से जुगाड़ लगाकर करता ही रहता है । दोस्त इसे प्यार से मिस्टर फ्रॉड भी कहते हैं, वैसे प्यार के मामले में ये बड़ा कंफ्यूज़ रहता है, इसे लाइफ में कई बार सच्चा प्यार हो चुका है, वैसे इसकी सबसे ख़ास दोस्त है, बचपन से... प्रतिभा । जो हर बुरे वक़्त में इसका साथ देती है और इसकी मद्द करती है ।
ज़िन्दगी वैसी भी नहीं होती जैसा हम हमेशा सोचते हैं, और हमेशा वो नहीं होता है जो हम चाहते हैं, होता तो बस वही है, जिसके लिए हम पूरी शिद्दत से कोशिश करते हैं और वो कोशिशें अगर रंग भी ले आएं । ये मुमकिन ही नहीं कि जैसा हम सोचें वही होने लगे और हर एक ख़्वाब पूरा हो जाए ।
क्योंकि ख़्वाबों और चाहतों की फ़ितरत भी छोटे से ज़िद्दी और शरारती बच्चों के जैसी ही होती है, जो मान जाएं तो गले से लग जाएं और जो न माने तो दूर चले जाएं । ऐसे ही इन पाँचों लड़कों के साथ भी होता है, इनके ख़्वाब और इनकी चाहतें तो बहुत हैं लेकिन हमेशा वही नहीं होता जो ये सोचते हैं । जब ये ख़्वाबों की दुनियाँ से बाहर निकल कर हक़ीक़त से रूबरू होते हैं तो मंजिलें कुछ और तो रास्ते कुछ और होते हैं । वक़्त अपनी पूरी रफ़्तार से चलता रहता है और पता ही नहीं चलता कि, “कब दिन गुज़रा ? कब रात आई ? और दिन – रात महीनों में बदलने लगे ।”  ऐसे ही यूनिवर्सिटी का एक साल पूरा कब गुज़र गया पता ही नहीं चला ? और इस एक साल में सबने ज़िन्दगी के कई सारे रंग देखे । यूनिवर्सिटी की पढाई, रेगुलर क्लासेज, क्लास टेस्ट, इंटरनल एग्जाम, सेमेस्टर एग्जाम, प्रैक्टिकल, लैब, फेस्ट, दोस्तों के बर्थ डे, क्लास बंक और न जाने क्या – क्या ? और इन्हीं सब के बीच किसी से प्यार तो किसी से तकरार, किसी की शिक़ायत तो किसी से झगड़ा ये सब चलता रहा । कभी आपस में बात बिगड़ी तो कभी बात होनी बंद हो गई ।
कभी जॉर्डन को लगा कि उसे ज़िन्दगी में सबकुछ मिल गया है, क्योंकि उसके हाथों में वो हाथ था जिसके वो ख़्वाब देखा करता था और उसकी तस्वीरें बनाया करता था । बहुत खुश था वो, अक्सर वो अपना वक़्त उसके साथ में गुज़ारा करता था उसे लगता था कि उसके प्यार की ख़ुशी उसकी अपनी ख़ुशी है । उसकी ख़ुशी देखकर सब दोस्तों की ख़ुशी बढ़ जाती थी । और फिर राजे अक्सर उसे बुलाकर सब दोस्तों को चाय और समोसे की पार्टी किया करता था । उस वक़्त जॉर्डन इतना ख़ुश था कि हर काम में सबसे आगे रहता था चाहे पढ़ना – लिखना हो या घूमना – फिरना हो या इंटर्नशिप । हर जगह वो दोस्तों की जान था । उस वक़्त वो वीडियोग्राफी का इतना शौक़ीन था कि यहाँ – वहाँ, इधर – उधर घूमने का प्लान बनाया करता था और सबको साथ में लेकर कंधे पर कैमरा लटकाए निकल पड़ता था । घंटों अपनी बाइक दौड़ाता रहता था, पूरे शहर के कोने – कोने में निकल जाता था सबके साथ शूट करने.....
To be continued.......
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